उज्जैन के महाकाल मंदिर में विस्तार कार्य के दौरान मिले प्राचीन अवशेष – शुभम केवलिया

उज्जैन के महाकाल मंदिर में विस्तार कार्य के दौरान मिले प्राचीन अवशेष - शुभम केवलिया Pradakshina Consulting PVT LTD Support Us
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  • रायपुर/उज्जैन/एक्ट इंडिया न्यूज
  • इन दिनों उज्जैन के महाकाल मंदिर के  विस्तारीकरण कार्य ने फिर एक बार इतिहास के नवीन पृष्ठों को उजागर करा है। पूर्व में निकले 900 वर्ष प्राचीन परमार कालीन मंदिर के अवशेषों जिसमें 11वी-12वी शताब्दी के मंदिर के अधिष्ठान एवं अन्य पुरातात्विक सामग्री को तो पुनः ढक दिया गया था परंतु विगत दिनों खुदाई कार्य में नए पुरावशेष देखने में आए हैं जो लगभग 2000 वर्ष पुराने हैं।
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  • पुरातत्वविद् शुभम केवलिया ने एक्ट इंडिया न्यूज से मोबाईल पर चर्चा करते हुए उन्होने बताया कि परिसर में हो रही खुदाई के फलस्वरूप बलुआ पत्थर निर्मित पिलर कैपिटल प्रकाश में आया है जिसने चार भरवाहकों की मूर्तियां भी हैं, प्रतिहार कालीन (9वी-10वी)  इस पिलर केपिटल में बनी चारों मूर्तियों के मुंह खण्डित हैं जो इस बात की ओर इशारा करते हैं कि 13वी शताब्दी में हुए मुस्लिम आक्रमण में मंदिर व मुर्तियों को नुकसान पहुंचाया गया था। यह पिलर केपिटल भी उसी मंदिर का भाग था। वर्तमान महाकाल मन्दिर में भी प्रतिहार कालीन मूर्तियां स्थापित हैं। इसके साथ ही बलुआ पत्थर से निर्मित एक खण्डित मूर्ति का निचला भाग भी प्रकाश में आया है।
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  • खुदाई में मंदिर के विभिन्न भाग यत्र-तत्र बिखरे हुए पाए गए हैं। इन भग्नावशेषों पर अंकित अलंकरण सिद्ध करते हैं कि काले पत्थर से बने यह स्तम्भ, आमलक आदि भाग परमार कालीन हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिहार काल के अवशेषों का प्रयोग परमार शासकों ने अपने द्वारा बनाए गए इस मंदिर में किया था क्योंकि उज्जैन प्रतिहार शासकों का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र था जिनका शासन यहाँ 9वी-10वी शताब्दी ईस्वी में था।
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  • शुभम केवलिया ने आगे बताया कि खुदाई में ही प्राप्त विशाल पत्थरों की जमावट प्राचीन दीवार जैसी है, यह कहा जा सकता है की यह दीवार भी परमार कालीन हैं पर अभी इसे निश्चित तौर पर दीवार मानना जल्दबाज़ी होगी। इतना ही नही तो विभिन्न प्रस्तरों को जोड़ने के लिए उपयोग में आने वाले लोहे के क्लिप भी कुछ प्रस्तर खंडों के साथ ही प्राप्त हुए हैं। जिस प्रकार से परमार एवं प्रतिहार कालीन प्रस्तर खंड प्राप्त हुए हैं उनसे ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक ही मंदिर के भाग हैं जिसका विध्वंस 13वी शताब्दी में इल्तुतमिश ने किया था।

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  • वैसे तो मुस्लिम आक्रमण का उल्लेख मंदिर में स्थित नागबन्ध अभिलेख में है, परंतु वह 11वी शताब्दी का है जिसके अनुसार उदयादित्य नामक शासक ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था, वह आक्रमण सम्भवतः 11वी शताब्दी में ही हुआ था।
  • पुरातत्वविद् ने कहा कि जहाँ एक ओर 1200 वर्ष पूर्व के स्थापत्य (आर्किटेक्चर) सम्बन्धित अवशेष प्राप्त हुए हैं वहीं दूसरी ओर गुप्त कालीन मिट्टी के बर्तन (रेड  वेयर) भी देखे जा सकते हैं, शुंग कालीन पुरावशेषों के प्राप्त होने से इस क्षेत्र का इतिहास लगभग 2000 वर्ष पीछे चला जाता है। इसके अतिरक्त यहां से मिट्टी की बनी छोटी मूर्तियां भी प्राप्त हुई हैं। कुषाण काल व गुप्त काल की ईंटें प्रकाश में आने से यह संकेत मिलते हैं कि इस क्षेत्र में 2000 वर्ष पूर्व भी स्थापत्यकला विद्यमान थी।
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  • पुरातत्वविद् शुभम केवलिया ने अन्त में कहा कि इस प्रकार हो रही खुदाई से पुरावशेषों को नुकसान पहुंच रहा है। आवश्यकता है कि विकास कार्य जारी रहे परन्तु चिन्हित जगह पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से पुरातात्विक उत्खनन हो जो पुरातत्वविद की देख-रेख में सम्पादित किया जाए क्योंकि गौरवशाली इतिहास को धूमिल कर उज्ज्वल भविष्य की संकल्पना तो बेईमानी सी प्रतीत होती है।
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