स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की कर मनमानी पर अंकुश लगाने जैन संवेदना ट्रस्ट ने आईआरडीए व केंद्रीय वित्त मंत्री को लिखा पत्र

स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की कर मनमानी पर अंकुश लगाने जैन संवेदना ट्रस्ट ने आईआरडीए व केंद्रीय वित्त मंत्री को लिखा पत्र Pradakshina Consulting PVT LTD Support Us
स्वास्थ्य बीमा कंपनियों ने कोरोनाकाल में
ग्राहकों को ऑफर देकर कराया बीमा और
विपत्ति आने पर मामूली कारण बताकर
कई क्लेम कर दिए रिजेक्ट
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  • रायपुर/एक्ट इंडिया न्यूज/25/06/2021
  • कोरोनाकाल में स्वास्थ्य बीमा कंपनियों व बैंकों ने आकर्षक लाभदायी ऑफर देकर ग्राहकों से थोक के भाव में हेल्थ इंश्योरेंस कराए और विपत्ति के समय जब ग्राहकों को बीमा राशि की जरूरत पड़ी तो मामूली कारण बताकर नियम-शर्तों में हेरफेर कर कई क्लेम रिजेक्ट कर दिए। स्वास्थ्य बीमा कंपनियों की इस बेरुखी और मनमानी का जैन संवेदना ट्रस्ट ने विरोध किया है। अपनी मेहनत से कमाई राशि से स्वास्थ्य बीमा लेने वाले ग्राहकों से छल करने वाली स्वास्थ्य बीमा कंपनियों पर अंकुश लगाने और बीमाधारी ग्राहकों को स्वास्थ्य पर खर्च हुई राशि दिलाने का आग्रह करते हुए जैन संवेदना ट्रस्ट ने भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीए) समेत केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा है।
  • जैन संवेदना ट्रस्ट के महेन्द्र कोचर, विजय चोपड़ा व कमल भंसाली ने बताया कि आईआरडीए व केंद्रीय वित्त मंत्री को लिखे पत्र में ट्रस्ट द्वारा कहा गया है कि कोरोना संक्रमण के दौरान लोगों ने इस आशय से बीमा कराया था कि यदि उन्हें इलाज की जरूरत पड़ी तो बीमा राशि से उनके खर्च का बोझ कम हो जाएगा लेकिन क्लेम करने पर उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला। बड़ी संख्या में इस मामले में बीमाधारक ग्राहक उपभोक्ता फोरम जा रहे हैं। बीमा कंपनियों ने मामूली और अजीबोगरीब तर्क देकर बड़ी तादात में बीमा क्लैम रिजेक्ट कर दिए।
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  • महेन्द्र कोचर ने बताया कि एक जानकारी के अनुसार पिछले पंद्रह माह के कोरोनाकाल के दौरान छत्तीसगढ़ में करीब दो लाख लोगों ने स्वास्थ्य बीमा लिया और इसी दौरान लगभग 60 हजार बीमाधारी ग्राहकों के क्लेम रिजेक्ट कर दिए गए, इनमें न केवल नई पॉलीसियां लेने वाले बल्कि पहले से ही हेल्थ इंश्योरेंस लिए हुए ग्राहक भी शामिल हैं। कई क्लेम इस आधार पर निरस्त कर दिए गए कि उनका इलाज अस्पताल में नहीं बल्कि निजी आइसोलेशन या होटल में हुआ और होम आइसोलेशन के मरीजों को बीमा का लाभ नहीं दिया जा सकता।
  • राजधानी रायपुर में ही ऐसे सैकड़ों केस पाए गए हैं कि जिनमें बीमा कंपनियों ने क्लेम यह कहकर रिजेक्ट कर दिया कि उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट देर से आई और रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं है कि इस अवधि में उनका इलाज किया भी गया है अथवा नहीं, इसके अलावा कंपनियों ने कई क्लेम यह कहकर खारिज कर दिए कि मरीज को माइल्ड लक्षण थे, उसका इलाज घर पर ही हो सकता था, इसकी बजाय उसने अस्पताल में इलाज कराया।
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  • बीमा कंपनियों ने नियम-शर्तों में हेरफेर कर क्लेम की समय सीमा 30 दिन तय कर दी, जबकि आइसोलेशन और कमजोरी की वजह से अधिकांश मरीज उस अवधि में क्लेम नहीं कर पाए, जिससे उनका केस ही रिजेक्ट कर दिया गया, क्या यह उचित है मरीज अपने स्वास्थ्य सुधार पर ध्यान केंद्रित करते या कमजोरी की अवस्था में क्लेम जमा की कार्यवाही करते।
  • ट्रस्ट के हरीश डागा व गुलाब दस्सानी ने कहा कि कंपनियों द्वारा होम आइसोलेशन, डॉक्टर से मिली प्रिस्केप्शन स्लीप, उपचार के लिए अस्पताल जाने की जरूरत नहीं थी, जैसे बहाने बताकर क्लेम रिजेक्ट किए जा रहे हैं, क्या बीमा कंपनियों की यह मनमानी उचित है, जबकि महामारी की आपदा के चपेट में आए उन हेल्थ इंश्योरेंस लेने वाले लोगों के बजट की बड़ी राशि इलाज में खर्च हो गई और अब बीमा कंपनियों  ने पिछले साल की तुलना में इस वर्ष प्रीमियम की राशि में 20 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी। इससे साफ जाहिर होता है कि कंपनियों के पास क्लेम सेटल करने के लिए पर्याप्त राशि नहीं थी।

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  • हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियों की ऐसी हरकतों से सवाल यही उत्पन्न होता है कि करोड़ों-लाखों की चिकित्सा बीमा राशि के ऑफर  देकर कंपनियों द्वारा क्षमता से अधिक संख्या में पॉलिसियां क्यों दी गई ? मौके का फायदा उठाते हुए केवल अधिक आय अर्जित करने के इरादे से कंपनियों का यह कृत्य क्या उपभोक्ताओं की जेब में डाका डालने जैसा नहीं है। प्रेषित पत्र में जैन संवेदना ट्रस्ट ने आईआरडीए व केंद्रीय वित्त मंत्री से आग्रह किया है कि वे स्वास्थ्य बीमा कंपनियों को निर्देशित करें कि बीमाधारी ग्राहकों को उनकी चिकित्सा व्यय राशि का समुचित लाभ अवश्य देवें। मानसिक-आर्थिक संकट के इस दौर में कंपनियां अपने वादे के अनुसार उनकी सहायता करें।

 

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